Saturday, 7 January 2017

दास्ताँ


दास्ताँ
दर्द की ये दास्ताँ, कह गयी कुछ तो मगर
रह गयी कुछ अनकही
देर तक बैठी रही, सुन रही ख़ामोशियाँ
रात यूँ जाती रही

लफ़्ज़ों के टुकड़ों के गुच्छे की थैली में
रक्खी थी तुमने कहीं
संग-ए-सितम की अपनी कहानी, और एक फ़साना वहीं
लफ़्ज़ों के टुकड़ें बिख़रे ज़मीं पर
सुनाए सितम की कहानी नयी

खोए, खोए निशाँ हैं तुम्हारे,
सूखी, सूखी पड़ी तेरी यादें
भूला, भूला है तुमको ज़माना,
फिर भी मिट ना सका ये एक फ़साना
सुनाए जो ग़म की तेरी कहानी
दोहरे ज़माने की दोहरी जुबानी