Monday, 24 July 2017

टैंक नामा


एक आवाज़ उठी है,
कि रेत को छोड़ कर
आ जाऊँ शहर में,

आ गया तो कुछ यूँ होगा,
चारों ओर स्टील की छोटी रेलिंग
और लोहे की ज़ंजीरों के बीच
घिरा रहूँगा,

शायद गेंदें के कुछ फूल भी इर्द-गिर्द होंगे
२६ और १५ को वो कुछ तो मेरे नाम भी होंगे,

कहते हैं कि याद दिलावूँगा मैं उन्हें कुछ
जो ख़ुद पढ़ते-लिखते हैं समझावूँगा उन्हें कुछ,

सच शायद ये है
कि धूप और बारिश में अकेला ही,
एक एनर्जी सेवर लैम्प के नीचे
पड़ा रहूँगा,
कुछ कुत्ते भी वही आस-पास सोए रहेंगे

लाए तो हैं मुझे मेरी नाद की तर्ज़ पर
अफ़सोस, झूठ है ये,
मैं तो बस ख़ामोश सुना करूँगा
वो तो लाने वाले हैं,
जो मेरे नाम पर बोला करेंगे।

Saturday, 14 January 2017

तुम और मैं

तुम और मैं

दिखने लगे हो जब से तुम ही हर सूँ
गोया ख़ुद को भूलने सा लगा हूँ ।

कभी कटार और कभी कतार से गुज़र कर
हर अक़्स में तेरा ही रुख़ पाने लगा हूँ ।

लफ़्ज़ों के जादुई गिरह खोलते हो ऐसे,
सन्नाटे में अपनी चीख़ दोहराने लगा हूँ ।

वक़्त का आग़ाज़ है ये, तो फिर यही सही
अपने ‘मन की बात’ को ताह देने लगा हूँ ।

तेरा तिलमिलाना, और यूँ व्यंग्य से मुस्कुराना
ख़ुद के होने पर कुछ इतराने लगा हूँ ।

कभी झाड़ू, कभी चरख़ा, और कभी सेल्फ़ी
तेरी सियासत का जनाज़ा उठाने लगा हूँ ।

Saturday, 7 January 2017

दास्ताँ


दास्ताँ
दर्द की ये दास्ताँ, कह गयी कुछ तो मगर
रह गयी कुछ अनकही
देर तक बैठी रही, सुन रही ख़ामोशियाँ
रात यूँ जाती रही

लफ़्ज़ों के टुकड़ों के गुच्छे की थैली में
रक्खी थी तुमने कहीं
संग-ए-सितम की अपनी कहानी, और एक फ़साना वहीं
लफ़्ज़ों के टुकड़ें बिख़रे ज़मीं पर
सुनाए सितम की कहानी नयी

खोए, खोए निशाँ हैं तुम्हारे,
सूखी, सूखी पड़ी तेरी यादें
भूला, भूला है तुमको ज़माना,
फिर भी मिट ना सका ये एक फ़साना
सुनाए जो ग़म की तेरी कहानी
दोहरे ज़माने की दोहरी जुबानी