Wednesday, 1 November 2017

सिनमाघरों में राष्ट्रीय गान क्यूँ?

अनुपम खेर साहेब को पत्र:

अनुपम खेर साहेब जब संगीनता से कोई बात कहते है तोह उसपर ध्यान देना चाहिए. वो एक मंझे कलाकार हैं और एक no-nonsense देशभक्त भी. जिस शक्स ने दिवंगत अमरीश पूरी की बोलती बंद कर दी थी, उसके लफ़्ज़ों के वज़न में कुछ भार तो ज़रूर होगा.

याद आता है दिदिऐलजे का वो अंत की तरफ़ का दृश्य जहाँ अपने बेटे के बारे में वो अपशब्द सहन ना कर सके थे. ‘बस...बस...स...स...स... मेरा बेटा मेरा ग़ुरूर है, मेरे ग़ुरूर को मत ललकारिए’. पंजाब के उस छोटे से गाँव की हवेली के कमरे में और साथ में देश भर के सिनमाघरों में गूँज गयी थी ये बात.

इस बार भी बात सिनमाघरों की ही है लेकिन ललकार बेटे के लिए नही बल्कि देश के लिए है. पूछते हैं वों कि भला क्या आपत्ति है लोगों को कि वे राष्ट्रगान के लिए बावन सेकंड के लिए भी खड़े नही हो सकते. जब लोग सिनमाघरों में जाने के लिए बाहर कतार में लग सकते हैं, रेस्तराँ में घुसने के लिए खड़े इंतेज़ार कर सकते हैं, तोह सिनेमा चालू होने के पहले बजने वाले राष्ट्रीय गान में खड़े क्यूँ नही हो सकते.

बहोत सोचते रहने के बाद भी इस तुलना का तुक मेरी समझ में तोह नही आया. पहली बात तोह यह कि बावन सेकंड पर इतना ज़ोर क्यूँ? मेरे कुछ मित्रों ने भी पहले कहा था कि यार बावन सेकंड खड़े रहने पर क्या बिगड़ जाएगा.

लिहाज़ा कुछ भी नही, लेकिन अगर हमारा राष्ट्र गान दो मिनट बावन सेकंड का होता तोह क्या इनमें से कुछ लोगों के पाँव में दर्द शुरू हो जाता? क्या वो इसीलिए खड़े होने पर राज़ी हैं क्यूँकि गान की अवधि सिर्फ़ बावन सेकंड है? अगर बात ये है तो, किसके राष्ट्रीयता पर सवाल उठना चाहिए: ना खड़े होने वालों के या खड़े होने वालों के?

गान की समय अवधि को सामने रखकर खड़े नही होने चाहने वालों के पारिवारिक संस्कार पर सवाल उठाने पर एक हिंदी कहावत याद आती है: दूसरे के कंधे पर बंदूक़ रख़कर गोली चलाना! खेर साहेब, संस्कार को घसीटना थोड़ा ओछा हो गया.

खेर साहेब राजनीतिक मसलों पर बेझिझक अपनी बातों को रखते हैं, इसीलिए उनसे ये तोह उम्मीद रखना लाज़िमी है कि बात वो चाहे जिस भी वैचारिक रंग का कहें, उसमें तर्क़ कि कमी ना आने पाए. लेकिन ऐसा हुवा नहीं.

सिनमाघरों में राष्ट्रीय गान बजना है या नहीं, ये मुद्दा ना तो समय का है ना संस्कार का.

हर event और जगह का अपना मर्यादा होता है. उसका संदर्भ भी उसी के दायरे में मायने रखता है. सिनमाघर ना तो पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी का लाल क़िला है ना ही वो तमाम स्कूल और कॉलेजों के मैदान जहाँ इन दो दिनों पर राष्ट्रीय गान भी होता है और ‘रंगारंग कार्यक्रम’ भी.  

सिनमाघरों में हर शो के पहले राष्ट्रीय गान बजने की वजह क्या है, ये तो खेर साहेब ने बतलाया नही. अगर उनका तर्क़ ये होगा कि गान पर खड़े होने से राष्ट्रीयता कि ऊर्जा और शक्ति सुनने वालों में त्वरित होगी, तोह उन्हें इस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है.

जो चीज़ें अहम होतीं हैं उन्हें आम नही बना देनी चाहिए. अगर मैं उनके वैचारिक सोंच से साझा रखता, जो मैं स्पष्ट तौर से नही रखता हूँ, तो भी मैं राष्ट्रगान का सिनमाघरों में बजाए जाने का विरोध करता. कहीं आप उसे बार बार बजाकर उसकी अहमियत तो नही गिरा रहें हैं?

पंद्रह और छब्बीस को राष्ट्रीय गान बजने का संदर्भ है - राष्ट्र-राज्य के इतिहास का संदर्भ, कुछ सांकेतिक रूप से महत्वपूर्ण तारीख़ को याद रखने का संदर्भ. क्रिकेट और फ़ुट्बॉल के मैदान पर भी संदर्भ देखा जा सकता है. एक देश दूसरे देश से खेलता है, हर देश का सूचक उसका गान बन जाता है. मुमकिन है बहुतों को ये भी पसंद नहीं आए लेकिन कुछ तार्किक संदर्भ सोंचे जा सकते हैं.

सिनमाघरों में राष्ट्रीय गान क्यूँ? सिनेमा मनोरंजन और व्यवसाय पर आधारित है. उसको दिखाने के पहले राष्ट्र-राज्य को याद करने का क्या अभिप्राय है? कोई ऐसा सांकेतिक दिन या समय भी नही है, दिन में चार बार बजना है. क्यूँ?

हम चाहते थे कि आपको ये पढ़ने में बावन सेकंड से ज़्यादा ना लगे लेकिन शायद कुछ अधिक लग गया होगा. इसके लिए मुआफ़ी चाहेंगे.

अंत में फिर से तुलना पर लौटते हैं. रेस्तराँ के क़तार में लगना और कितनी देर तक लगे रहना ये दो बातों पर निर्भर होता है - वहाँ खाना कितना अच्छा मिलता है और भूख कितनी ज़ोर की लगी हुई है. अगर आस्वशत हैं कि खाने का ज़ायक़ा उमदा है तो भूख ज़्यादा देर तक बर्दाश्त की जा सकती है. मतबल ये कि खड़े रहना है या दूसरे रेस्तराँ की तरफ़ बढ़ने का फ़ैसला आपके समय, आपका आंकलन कि खाना कितना विशिष्ट है, और आपकी अपनी भूख पर निर्भर करता है. अगर आप वहाँ कि क़तार से निकल जाते हैं तो साथी क़तार वाले ना ही आपको थप्पड़ मारेंगे ना ज़बरदस्ती आपके मूँह में पनीर टिक्का ठूँस देंगे.

अगर खेर साहेब अपनी तुलना से ये कहना चाहते हैं कि सबको अपने समय, आंकलन और भूख के मुताबिक़ ये तय करने का हक़ है कि वो खड़े रहना चाहते हैं कि नही, तो खेर साहेब को मुबारकबाद. उन्होंने अनजाने में एक बहोत बड़ी बात कह दी. हर लोग को सिनमाघर के अंदर ये तय करने का हक़ होगा की खड़ा होना है या नही. खेर साहेब, अगर आपकी तुलना का ये विश्लेषण आपको अटपटी लग रही है तब आप शायद समझ गए होंगे कि आपकी तुलना ख़ुद में कितनी अटपटी थी.

आपका आभारी,

   
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Monday, 24 July 2017

टैंक नामा


एक आवाज़ उठी है,
कि रेत को छोड़ कर
आ जाऊँ शहर में,

आ गया तो कुछ यूँ होगा,
चारों ओर स्टील की छोटी रेलिंग
और लोहे की ज़ंजीरों के बीच
घिरा रहूँगा,

शायद गेंदें के कुछ फूल भी इर्द-गिर्द होंगे
२६ और १५ को वो कुछ तो मेरे नाम भी होंगे,

कहते हैं कि याद दिलावूँगा मैं उन्हें कुछ
जो ख़ुद पढ़ते-लिखते हैं समझावूँगा उन्हें कुछ,

सच शायद ये है
कि धूप और बारिश में अकेला ही,
एक एनर्जी सेवर लैम्प के नीचे
पड़ा रहूँगा,
कुछ कुत्ते भी वही आस-पास सोए रहेंगे

लाए तो हैं मुझे मेरी नाद की तर्ज़ पर
अफ़सोस, झूठ है ये,
मैं तो बस ख़ामोश सुना करूँगा
वो तो लाने वाले हैं,
जो मेरे नाम पर बोला करेंगे।

Saturday, 14 January 2017

तुम और मैं

तुम और मैं

दिखने लगे हो जब से तुम ही हर सूँ
गोया ख़ुद को भूलने सा लगा हूँ ।

कभी कटार और कभी कतार से गुज़र कर
हर अक़्स में तेरा ही रुख़ पाने लगा हूँ ।

लफ़्ज़ों के जादुई गिरह खोलते हो ऐसे,
सन्नाटे में अपनी चीख़ दोहराने लगा हूँ ।

वक़्त का आग़ाज़ है ये, तो फिर यही सही
अपने ‘मन की बात’ को ताह देने लगा हूँ ।

तेरा तिलमिलाना, और यूँ व्यंग्य से मुस्कुराना
ख़ुद के होने पर कुछ इतराने लगा हूँ ।

कभी झाड़ू, कभी चरख़ा, और कभी सेल्फ़ी
तेरी सियासत का जनाज़ा उठाने लगा हूँ ।

Saturday, 7 January 2017

दास्ताँ


दास्ताँ
दर्द की ये दास्ताँ, कह गयी कुछ तो मगर
रह गयी कुछ अनकही
देर तक बैठी रही, सुन रही ख़ामोशियाँ
रात यूँ जाती रही

लफ़्ज़ों के टुकड़ों के गुच्छे की थैली में
रक्खी थी तुमने कहीं
संग-ए-सितम की अपनी कहानी, और एक फ़साना वहीं
लफ़्ज़ों के टुकड़ें बिख़रे ज़मीं पर
सुनाए सितम की कहानी नयी

खोए, खोए निशाँ हैं तुम्हारे,
सूखी, सूखी पड़ी तेरी यादें
भूला, भूला है तुमको ज़माना,
फिर भी मिट ना सका ये एक फ़साना
सुनाए जो ग़म की तेरी कहानी
दोहरे ज़माने की दोहरी जुबानी




Sunday, 9 October 2016

… कुछ तो लोग (नहीं) कहेंगे?

न्यूज़ और हेड्लाइंज़ निश्चय ही सुर्ख़ियाँ बनाती हैं। लेकिन ये रोल सिर्फ़ मीडिया तक सीमित नहीं है, ऐसा जान पड़ता है। हमलोग जो न्यूज़ पढ़ते हैं, उस पर बोलते हैं, चाहे टीवी के शोरगुल वाले शोज़ में या महज़ अपने ड्रॉइंग रूम के सोफ़े पर बैठ कर, वो भी न्यूज़ को सुर्खी बनाने में उतना ही अहम भूमिका अदा करते हैं। हाल के दिनों में ये बात आजकल के सबसे ज़्यादा चर्चित न्यूज़ ऐंकर रवीश कुमार ने बेहतरीन ढंग से रक्ख़ा है। उनके समवाद की कुछ बातें आलंकारिक हैं लेकिन बिल्कूल प्रासंगिक। 
इसका हालाँकि एक विपरीत लेकिन पूरक पहलू भी है। और वो है हमारी चुप्पी। किसी समाचार पर हम ज़्यादा बोलते हैं और किसी पर कम। और ये स्वाभाविक भी है और इसके बहोत से कारण हो सकते हैं। किसी विषय पर पकड़ ज़्यादा होती है, किसी में इंट्रेस्ट कम।आख़िर एक संतुलित लेख लिखने या कोई सांगितिक बात कहने के लिए, जो दूसरों को सोचने पर मजबूर करे, ये ज़रूरी है कि सतह से नीचे जाकर स्थिति को समझें। असल में अगर एक ही व्यक्ति सारे विषय पर पारंगत तरीक़े से बोलने लगे या कोशिश करे तब थोड़ी शंका ज़रूर होनी चाहिए। इसलिए ये बात ख़ुद में कोई खंडन या आरोप का विषय नहीं है की फ़लाने ने इस और इस सबजेक्ट पर क्यूँ नहीं बोला। 
जो नैतिक और व्यवाहरिक विवेक हमें बोलने की आज़ादी देता है वही चुप रहने की भी। चुप रहने के भी विभिन्ह अर्थ हैं। इसलिए उसके कारण भी अलग अलग हो सकते हैं। लेकिन क्या हम या हमारे बीच के लोग सिर्फ़ नैतिक विवेक के तहत ही चुप रहते हैं? क्या किसी विषय पर चुप्पी को एक ऐकडेमिक इंट्रेस्ट के हवाले से ही समझा जाना चाहिए? या हमारे ऑडिबल इन्वायरॉन्मेंट में व्यक्तिगत और वैचारिक निकट्टा और दूरी की भी कोई भूमिका होती है? प्रायः हम उस विषय पर बोलते हैं और ज़्यादा बोलते हैं जिसके लिए ज़्यादा प्रतिबद्ध महसूस करते हैं। ग़ौर दें कि अगर ये बात सही है तो मूल बात यहाँ प्रतिबद्धता का है, एक राजनैतिक और सामाजिक चेतना और उससे जुड़े प्रतिबद्धता का।
बोलने और लिखने की प्रक्रिया हमारी प्रतिबद्धता दिखलाती है। दूसरे लफ़्ज़ में कहें तो विषय महत्वपूर्ण होता है। प्रतिबद्धता इशू के प्रति होती है या होनी चाहिए। मगर लाज़िमी है कि हम तब भी बोलते हैं जब दूसरों के विचारों से सहमत नहीं होते हैं। विचार और विषय का रिश्ता क्या सिर्फ़ वैचारिक ताने बाने से ही जुड़ा होता है या कुछ और भी कड़ियाँ साथ में फँसी होती हैं? अहम बात इसलिए बोलने और ना बोलने का नहीं है, बल्कि इसका है कि क्या एक ही तरह के विषय पर हम भेद-भाव करके बोलते हैं? ये ज़रूर सोचना चाहिए कि बोलते वक़्त हम किस तरह से बोलते हैं और अगर चुप रहे तो वो चुप्पी क्या कहती है। 
ये भी सोचना चाहिए कि जब बोलते हैं तो कब बोलते हैं और किस पिच पर। समय और जगह मायने रखती हैं। आख़िरकार जो बोलने कि राजनीति होती है वही चुप रहने की भी हो सकती है।
अगर आज के ऑडिबल इन्वायरॉन्मेंट पर ध्यान डालें तो हर सप्ताह का एक न्यूज़ साइकल होता है। जो होना भी चाहिए अगर बड़ी छोटी ख़बरें देश भर से आती रहती हैं तो। घटनाक्रम दिखलाया जाता है जिसका पहले तथ्य बताया जाता है और फिर विशेलशन दिया जाता है। आज के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ऊँचे ऑडिबल स्वरों को पढ़कर, सुनकर और देखकर कभी कभी ये समझना मुश्किल हो जाता है कि तथ्य कहाँ ख़त्म होता है और विश्लेषण शुरू। शायद तथ्य और विश्लेषण में भी वही पेचीदा रिश्ता है जो विषय और विचार के बीच है। इस कड़ी का जो भी नाम हो, वो नहीं पता, लेकिन विगत कुछ दिनों के घटनाक्रम और उसके ऊपर हुवे प्रतिक्रिया को देखकर ऐसा लगता है कि इस कड़ी के एक छोर पर वैचारिक द्दृष्टिकोण होती है और दूसरे पर व्यक्तिगत परस्थितियाँ। ज़रूरी नहीं कि ये दोनों स्वतः या हमेशा (by default) टकराहात की स्तिथि में रहे। ये एक बहुत सिनिकल सोंच होगा। इसीलिए हमारे बोलने और चुप रहने में समय और जगह का महत्त्व होता है। वे दोनों मिलकर संदर्भ निर्धारित करतीं हैं। 
घटनाक्रम और उसके ऊपर तमाम क़िस्म के प्रतिक्रियाओं को प्रचारित और प्रसारित करने में सोशल मीडिया और नए प्रकार के वेब आधारित न्यूज़ साइट्स का योगदान अभूतपूर्व है, ऐसा लगने लगा है। सोफ़े पर आग उगलते या दम तोड़ते डिस्कशन इससे जुदा नहीं हैं। अब सच में मुट्ठी में फ़ोन और टैब्लेट है। इंस्टंट नूडल्स की तरह इंस्टंट प्रतिक्रिया आती है। ख़ास तौर से सोशल मीडिया पर जहाँ विचार और वैचारिक अभिव्यक्ति खुल कर सामने आती है। कुछ ज़्यादा ही खुलकर जिसका परिणाम अक्सरआह उसके विकृत स्वरूप ट्रोलिंग में दिखता है। ट्रोलिंग वैचारिक होने का एक चरम है ना कि उसका खंडन। 
लेकिन ट्रोलिंग तो प्रतिक्रिया के धनुक का सिर्फ़ एक चरम बिंदु है। बाक़ी क्या होता है वहाँ उसपर भी ग़ौर फ़रमाना चाहिए। सोशल मीडिया पर किसी न्यूज़ को शेयर करने के पहले ‘शेम’ लिखना, किसी के पहले ‘ब्रिल्यंट’ का बोर्ड लटका देना - ये मात्र शब्द नहीं हैं बल्कि पढ़ने वालों के लिए एक सूचक या संकेतक भी हैं। अगर अच्छी है तो दूसरे लोग इस शेयर को लाइक करें इसकी भी उम्मीद बनी रहती है। सिर्फ़ लाइक ही नहीं बल्कि दोबारा शेयर करें। कभी कभी लगता है शेयर करना एक वैचारिक फ़र्ज़ है और साथ में दोस्ती निभाने का व्यक्तिगत भी। शेम वाले न्यूज़ को और अधिक लोग शेम लिखकर शेयर करें ये भी अपेक्षा रहती है। यह वैचारिक खुलापन एक दूसरे स्तर पर ये भी दिखलाता है कि कौन ‘अपने’ जैसा सोचता है और कौन नहीं। 
कुछ तो इस स्पेस और माध्यम का अपना स्वभाव, लहजा और मिज़ाज भी है कि अपने और पराए को ढूँढ़ने और चिन्हित करने की होड़ सी मच जाती है। इस खुलेपन में जमकर खेमाबाज़ी होती है। फिर यह सवाल उठाना ना ही असांगितिक होगा ना अतार्किक ही कि क्या हमारे बोलने और लिखने के क्रम को ये खेमेबाज़ी प्रभावित करती है? इससे जुड़ा, क्या जब किसी विषय पर ‘अपने’ जैसे लोग अलग मत रखते हैं तो क्या वे कम ‘अपने’ हो जाते हैं? क्या उनके विचार कम प्रतिबद्ध नज़र आने लगते हैं? 
अपनापन, भाईचारा, बिरादरी - ये सिर्फ़ मानवीय या सामाजिक बंधनों को ही नहीं दिखलाता है बल्कि वैचारिक और राजनैतिक गुट, ग्रुप, और खेमे में भी बसता है। मुमकिन हो कि ये बात जितनी सहजता से कही जा सकती है उतनी सहजता से मानी नहीं। मदर इंडिया में माँ का बेटे को मारना और ज़ंजीर में भाई का भाई पर गोली चलाना ये रील नैतिक आदर्शवादिता क्या रीयल में भी दिखता है? गोली चलाने का मतलब या अभिप्राय लिंचिंग से बिल्कूल भी नहीं है। इसका सहज मतलब निरपेक्षता से है। 
या रील लाइफ़ के विपरीत यथार्थ में हम ‘अपने’ और ‘पराए’ का भेद सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं? यथार्थ का यारी दोस्ती कैसे इस आदर्शवादिता को पूर्ण या खंडित करती है? जब बात बड़े और अहम राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों का हो तो ये पूछना और सोचना ज़रूरी है। क्या ‘घर के मुद्दों’ पर एक नज़रिया होता है और वही मुद्दे जब सड़कों, बसों, शहरों, क़स्बों और खलियानों में घटित होते हैं तो हम दूसरा नज़रिया अख़्तियार कर लेते हैं? क्या घर के अंदर ‘मंथन और चिंतन’ होता है और घर के बाहर तोहमत और छींटा कशी? क्या कुछ अत्यंत समवेदनशील मुद्दों पर बोलने का अर्थ ही ये नहीं है कि इस अंदर और बाहर के दूरी और विभाजन पर कठोरता से सवाल उठाना? 
बतौर उधाहरण, रेप और औरतों के सोशण से जुड़े मुद्दे में अक्सर ये देखा गया है कि ‘घर’ और ‘अंदर’ के लोग शामिल होते हैं। इन हालातों में विषय और उससे जुड़े प्रतिबद्धता पर अपेक्षित वैचारिक निष्पक्षता का क्या होता है? क्या उसे थोड़े दिन के लिए निलंबित कर दिया जाता है? क्या उसे बीमार घोषित कर हस्पताल में कुछ दिन के लिए दाख़िल करा दिया जाता है? या फिर विचार और वैचारिकता को ही नया जामा पहनाने की कोशिश किया जाता है? उन बारीकियों को ढूँढा जाता है जो पहले नहीं दिखती थीं या देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी थी? बारीकियां ढूँढने को साज़िश नहीं कहेंगे क्यूँकि ये हमारे सोंच में पैनापन लाती हैं लेकिन इसके साथ ही साथ ये ज़रूर पूछना चाहिए कि बारीकियों के तरफ़ बढ़ने का संदर्भ क्या होता है? अगर औरतों के सोशण और हिंदी फिल्म जगत पर एक बार ध्यान फेरें तो ‘दामिनी’ जैसे फिल्म की याद आती है जब लीगल भाषा में बारीकियों को निकाल कर सोशण के मुद्दे को दरकिनार कर दिया जाता है। बोलने की राजनीति होती है, चुप रहने की राजनीति होती है, बारीकियां ढूँढने की भी राजनीति होती है क्या? 
कुछ लोगों को ये सवाल बेबुनियादी लग सकता है। कुछ को रेटॉरिकल। लेकिन कुछ को ये असहज बना सकती हैं। इनको उठाने के पीछे का मक़सद भी यही है कि असहजता को बिना ज़रूरत से ज़्यादा सवारें रक्खा जाए। ये आरोप और प्रत्यारोप के सेंटिमेंट से नहीं लिखा गया है। 
एक पारदर्शी बौधिक माहौल में सवाल उठने चाहिए। पहला सवाल शायद पारदर्शिता के स्वरूप पर ही उठना चाहिए। पीछले कुछ दिनों के घटनाक्रम में बहुत समवेदनशील मुद्दे सामने आए हैं। कुछ लेख भी आएँ हैं जो कारण बने हैं इन सवालों को उठाने के। व्यक्ति या ‘केस’ का नाम लेना ज़रूरी नहीं है। दो कारणों से। पहला, नाज़ुक मुद्दों पर समवेदनशीलता बनी रहनी चाहिए। दूसरा, मक़सद मतभेद के तर्ज़ पर तूतू-मैंमैं करने का नहीं है। 

नोट: इस लेख को लिखने में शुक्रगुज़ार हूँ नितिन वर्मा का जिसके साथ तमाम मसलों पर लिखने दौरान लंबी बातचीत होती रही। पंकज कुमार झा ने इस लेख का पहला मसौदा पढ़ कर अपने मददगार विचार दिए थे।

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